समाज में स्त्रियों की दशा ठीक थी ।
बाल विवाह नही होते थे ।
बहुविवाह और विधवा विवाह प्रचलित थे ।
मैत्रायणी संहिता में मनु की १० पत्नियों का उल्लेख हुआ है ।
महिलाएं उत्सवों और धार्मिक समारोहों में भाग ले सकती थी ।
उन्हें राजनितिक व धन सम्बन्धी अधिकार प्राप्त नही थे ।
उनकी सामाजिक व धार्मिक प्रतिष्ठा ऋग्वैदिक काल की अपेक्षा कम हो गई थी ।
अथर्ववेद कन्या के जन्म की निंदा करता है ।
मैत्रायणी संहिता में तो स्त्री को सुरा और द्युत की श्रेणी में रखा गया है ।