प्राचीनकाल में कश्मीर हिन्दू और बौद्ध संस्कृतियों का पालना रहा है. कश्मीर का नाम महर्षि कश्यप के नाम पर पड़ा .
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Wednesday, April 6, 2011
Wednesday, November 11, 2009
संगम काल में ब्राम्हण मांस व मदिरा का भक्षण करते थे ....
दक्षिण भारत का इतिहास थोडा उलझा हुआ है लेकिन बहुत मजेदार भी है । कहा जाता है की अगस्त्य ऋषि ने विन्ध्य पर्वत के घमंड को चूर चूर कर वैदिक धर्म को दक्षिण भारत में पहुंचाया । उन्होंने वातापी नामक राक्षश को मारकर मानव जीवन पर बहुत बड़ा उपकार किया ।
दक्षिण में भी वैदिक संस्कृति का खूब प्रचार प्रसार हुआ । वहां के ब्राम्हण भी समाज में श्रेष्ठ स्थान रखते थे पर वे मांस व मदिरा का भक्षण करते थे और उन्हें कोई सामाजिक अपयश भी नहीं होता था जबकि उतर भारत में ऐसी बात नहीं थी ।
चेर राज्य में पत्नी पूजा का उल्लेख मिलता है इससे नारी के महत्व का पता चलता है । महिलायें राजा की अंगरक्षक भी होती थी । मुरुगन नामक देवता की पूजा की जाती थी जिनका एक नाम सुब्रमन्यम भी मिलता है । इनकी पत्नी का नाम कूरुवास मिलता है । पुहार यानी कावेरिपतानाम में इन्द्र की पूजा का भी उल्लेख मिलता है । वेल्नादल एक नृत्य होता था जिसमे पुजारी शिव की पूजा करते हुए और नाचते हुए अपने आप में खो जाता था ।
दक्षिण में भी वैदिक संस्कृति का खूब प्रचार प्रसार हुआ । वहां के ब्राम्हण भी समाज में श्रेष्ठ स्थान रखते थे पर वे मांस व मदिरा का भक्षण करते थे और उन्हें कोई सामाजिक अपयश भी नहीं होता था जबकि उतर भारत में ऐसी बात नहीं थी ।
चेर राज्य में पत्नी पूजा का उल्लेख मिलता है इससे नारी के महत्व का पता चलता है । महिलायें राजा की अंगरक्षक भी होती थी । मुरुगन नामक देवता की पूजा की जाती थी जिनका एक नाम सुब्रमन्यम भी मिलता है । इनकी पत्नी का नाम कूरुवास मिलता है । पुहार यानी कावेरिपतानाम में इन्द्र की पूजा का भी उल्लेख मिलता है । वेल्नादल एक नृत्य होता था जिसमे पुजारी शिव की पूजा करते हुए और नाचते हुए अपने आप में खो जाता था ।
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संगम
Thursday, November 5, 2009
पाटलिपुत्र
पटना बिहार राज्य की राजधानी है और गंगा नदी के दक्षिणी किनारे पर अवस्थित है| जहां पर गंगा घाघरा, सोन और गंडक जैसी सहायक नदियों से मिलती है.
सिक्खों के 10वें तथा अंतिम गुरु गुरू गोबिंद सिंह का जन्म पटना में हीं हुआ था|
पटना नाम पटनदेवी से प्रचलित हुआ है । एक अन्य मत के अनुसार यह नाम संस्कृत के पत्तन से आया है जिसका अर्थ बन्दरगाह होता है।
मेगास्थनिज ने इस शहर को पालिबोथरा तथा चीनीयात्री फाहियान ने पालिनफू के नाम से संबोधित किया है।
पटना का इतिहास 490 ईसा पूर्व से होता है जब हर्यक वंश के शासक अजातशत्रु ने अपनी राजधानी राजगृह या राजगीर से बदलकर यहाँ स्थापित की.
ईसवी सन 1912 में बंगाल विभाजन के बाद, पटना उड़ीसा तथा बिहार की राजधानी बना.
1935 में उड़ीसा बिहार से अलग कर एक राज्य बना दिया गया । पटना राज्य की राजधानी बना रहा ।
आई एफ़ मुन्निंग ने पटना के प्रशासनिक भवनों का निर्माण किया। संग्रहालय, उच्च न्यायालय, विधानसभा भवन इत्यादि बनाने का श्रेय उन्हीं को जाता है।
मुगल बादशाह औरंगजेब ने अपने प्रिय पोते मुहम्मद अज़ीम के अनुरोध पर 1704 में, शहर का नाम अजीमाबाद कर दिया.
अंग्रेज़ों ने 1620 में रेशम तथा कैलिको के व्यापार के लिये यहाँ फैक्ट्री खोली।
पटना की जनसंख्या वर्ष 2001 की जनगणना के अनुसार 12,85,470 है.
गंगा नदी पर बने महात्मा गांधी सेतु के द्वारा पटना हाजीपुर से जुड़ा है।
पटना के अंतरराष्ट्रीय हवाई पट्टी का नाम लोकनायक जयप्रकाश नारायण हवाई अड्डा है और यह नगर के पश्चिमी भाग में स्थित है।
पटना शहर १६८० किलोमीटर लंबे इलाहाबाद-हल्दिया राष्ट्रीय जलमार्ग संख्या-१ पर स्थित है।
ख़ुदाबख़्श लाईब्रेरी 1891 में स्थापित हुआ था। यहाँ कुछ अतिदुर्लभ मुगल कालीन पांडुलपियां हैं.
तख्त श्रीहरमंदिर पटना सिखों के दसमें और अंतिम गुरु गोविन्द सिंह की जन्मस्थली है। नवम गुरु श्री तेगबहादुर के पटना में रहने के दौरान गुरु गोविन्दसिंह ने अपने बचपन के कुछ वर्ष पटना सिटी में बिताए थे।
1786 ईस्वी में जॉन गार्स्टिन द्वारा निर्माण के बाद से गोलघर पटना शहर क प्रतीक चिह्न बन गया।
सिक्खों के 10वें तथा अंतिम गुरु गुरू गोबिंद सिंह का जन्म पटना में हीं हुआ था|
पटना नाम पटनदेवी से प्रचलित हुआ है । एक अन्य मत के अनुसार यह नाम संस्कृत के पत्तन से आया है जिसका अर्थ बन्दरगाह होता है।
मेगास्थनिज ने इस शहर को पालिबोथरा तथा चीनीयात्री फाहियान ने पालिनफू के नाम से संबोधित किया है।
पटना का इतिहास 490 ईसा पूर्व से होता है जब हर्यक वंश के शासक अजातशत्रु ने अपनी राजधानी राजगृह या राजगीर से बदलकर यहाँ स्थापित की.
ईसवी सन 1912 में बंगाल विभाजन के बाद, पटना उड़ीसा तथा बिहार की राजधानी बना.
1935 में उड़ीसा बिहार से अलग कर एक राज्य बना दिया गया । पटना राज्य की राजधानी बना रहा ।
आई एफ़ मुन्निंग ने पटना के प्रशासनिक भवनों का निर्माण किया। संग्रहालय, उच्च न्यायालय, विधानसभा भवन इत्यादि बनाने का श्रेय उन्हीं को जाता है।
मुगल बादशाह औरंगजेब ने अपने प्रिय पोते मुहम्मद अज़ीम के अनुरोध पर 1704 में, शहर का नाम अजीमाबाद कर दिया.
अंग्रेज़ों ने 1620 में रेशम तथा कैलिको के व्यापार के लिये यहाँ फैक्ट्री खोली।
पटना की जनसंख्या वर्ष 2001 की जनगणना के अनुसार 12,85,470 है.
गंगा नदी पर बने महात्मा गांधी सेतु के द्वारा पटना हाजीपुर से जुड़ा है।
पटना के अंतरराष्ट्रीय हवाई पट्टी का नाम लोकनायक जयप्रकाश नारायण हवाई अड्डा है और यह नगर के पश्चिमी भाग में स्थित है।
पटना शहर १६८० किलोमीटर लंबे इलाहाबाद-हल्दिया राष्ट्रीय जलमार्ग संख्या-१ पर स्थित है।
ख़ुदाबख़्श लाईब्रेरी 1891 में स्थापित हुआ था। यहाँ कुछ अतिदुर्लभ मुगल कालीन पांडुलपियां हैं.
तख्त श्रीहरमंदिर पटना सिखों के दसमें और अंतिम गुरु गोविन्द सिंह की जन्मस्थली है। नवम गुरु श्री तेगबहादुर के पटना में रहने के दौरान गुरु गोविन्दसिंह ने अपने बचपन के कुछ वर्ष पटना सिटी में बिताए थे।
1786 ईस्वी में जॉन गार्स्टिन द्वारा निर्माण के बाद से गोलघर पटना शहर क प्रतीक चिह्न बन गया।
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Monday, September 21, 2009
तालीकोटा और विजयनगर साम्राज्य का अंत
तालीकोटा वर्तमान में कर्णाटक राज्य के बीजापुर जिले में एक छोटा सा शहर है । यह दोनी नामक नदी के तट पर स्थित है । दक्षिण भारत में यह नगर विजयनगर साम्राज्य की राजधानी रहा । २३ जनवरी १५६५ को तालीकोटा में ही यहाँ के तत्कालीन शासक रामराय और दक्षिण भारत के चार मुस्लिम राज्यों की संयुक्त सेनाओं के बीच अपने अस्तित्व की रक्षा के लिए युद्घ हुआ जिसे तालीकोटा का युद्घ कहा जाता है । विजयनगर का शासक रामराय मुस्लिम राज्यों की संयुक्त सेनाओं का सामना नही कर सका और युद्घ करते हुए मारा गया । इसे राक्शनी तांगादी का युद्घ भी कहा जाता है । युद्घ के बाद मुस्लिम सेनाओं ने विजयनगर को खूब लूटा ,हजारो संख्या में हिंदू मारे गए । इस युद्घ के कारण विजयनगर साम्राज्य का पतन हो गया । इस प्रकार एक गौरवशाली हिंदू साम्राज्य का अंत हो गया ।
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Thursday, September 10, 2009
उतर वैदिक काल में महिलाएं ....
समाज में स्त्रियों की दशा ठीक थी ।
बाल विवाह नही होते थे ।
बहुविवाह और विधवा विवाह प्रचलित थे ।
मैत्रायणी संहिता में मनु की १० पत्नियों का उल्लेख हुआ है ।
महिलाएं उत्सवों और धार्मिक समारोहों में भाग ले सकती थी ।
उन्हें राजनितिक व धन सम्बन्धी अधिकार प्राप्त नही थे ।
उनकी सामाजिक व धार्मिक प्रतिष्ठा ऋग्वैदिक काल की अपेक्षा कम हो गई थी ।
अथर्ववेद कन्या के जन्म की निंदा करता है ।
मैत्रायणी संहिता में तो स्त्री को सुरा और द्युत की श्रेणी में रखा गया है ।
बाल विवाह नही होते थे ।
बहुविवाह और विधवा विवाह प्रचलित थे ।
मैत्रायणी संहिता में मनु की १० पत्नियों का उल्लेख हुआ है ।
महिलाएं उत्सवों और धार्मिक समारोहों में भाग ले सकती थी ।
उन्हें राजनितिक व धन सम्बन्धी अधिकार प्राप्त नही थे ।
उनकी सामाजिक व धार्मिक प्रतिष्ठा ऋग्वैदिक काल की अपेक्षा कम हो गई थी ।
अथर्ववेद कन्या के जन्म की निंदा करता है ।
मैत्रायणी संहिता में तो स्त्री को सुरा और द्युत की श्रेणी में रखा गया है ।
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Saturday, July 4, 2009
shankerdeva
In the late fifteenth century, shankerdeva emerged as one of the leading proponents of vaishnavism in assam. his teachings known as the bhagwati dharma . his teachings mainly based on bhagavad gita and the bhagavat purana . He emphasised the need for naam kirtan,recitation of the names of the lord in sat sanga or congregation of pious devotees.He also encouraged the establishment of satra or monasteries for the transmission of spiritual knowledge. his major composition include the kirtana ghosha.
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शंकरदेव
Friday, June 5, 2009
किशनगढ़ शैली

किशनगढ़ का सर्वाधिक महत्वपूर्ण शासक सावंतसिंह था , जिसने किशनगढ़ शैली के विकास में अभूतपूर्व योगदान दिया ।
किशनगढ़ एक छोटी सी रियासत थी , जो अजमेर और आमेर के बिच अवस्थित थी ।
सावंत सिंह का उपनाम नागरीदास था ।
उसने राधा कृष्ण की अराधना के लिए भक्ति संगीत की रचना की ।
किशनगढ़ की सबसे उत्कृष्ट कृति बनी ठानी है ,जिसके चित्रकार निहाल चंद है ।
निहाल चंद को नागरीदास का संरक्षण प्राप्त था ।
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Friday, May 1, 2009
धौलाविरा नगर ....
धौलाविरा नगर प्राचीर द्वारा संरक्षित समानांतर चतुर्भुज के आकार में था ।
यह नगर आज गुजरात के कच्छ जिले के भचाऊ तालुका में एक छोटा सा गाँव है ।
इसकी खोज १९६७-६८ में जे पी जोशी ने की थी ।
यहाँ से हड़प्पा सभ्यता के तिन चरणों का पता चलता है ।
यहाँ से घोडे के अवशेष एवं जानवर की कांस्य आकृति प्राप्त होती है ।
हड़प्पा सभ्यता का एकमात्र स्टेडियम यही से प्राप्त हुआ है ।
यहाँ की सबसे आश्चर्यजनक वस्तु विशाल जलाशय है ।
यह नगर तिन भागों में विभाजित था -दुर्ग ,मध्य तथा निचला नगर ।
यह नगर आज गुजरात के कच्छ जिले के भचाऊ तालुका में एक छोटा सा गाँव है ।
इसकी खोज १९६७-६८ में जे पी जोशी ने की थी ।
यहाँ से हड़प्पा सभ्यता के तिन चरणों का पता चलता है ।
यहाँ से घोडे के अवशेष एवं जानवर की कांस्य आकृति प्राप्त होती है ।
हड़प्पा सभ्यता का एकमात्र स्टेडियम यही से प्राप्त हुआ है ।
यहाँ की सबसे आश्चर्यजनक वस्तु विशाल जलाशय है ।
यह नगर तिन भागों में विभाजित था -दुर्ग ,मध्य तथा निचला नगर ।
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हड़प्पा सभ्यता
Thursday, April 30, 2009
राग्दर्पण......
भारतीय शास्त्रीय पुस्तक ''राग्दर्पण '' का अनुवाद फिरोजशाह तुगलक के शासनकाल में किया गया था । यह अनुवाद फ़ारसी में था ।
फिरोजशाह के काल में ही एक अन्य ग्रन्थ'' नक्षत्र शास्त्र'' का अनुवाद दल्याले फिरोज्शाही के नाम से किया गया था । यह अनुवाद एज्जुदीन किरमानी द्वारा किया गया ।
फिरोजशाह के काल में ही एक अन्य ग्रन्थ'' नक्षत्र शास्त्र'' का अनुवाद दल्याले फिरोज्शाही के नाम से किया गया था । यह अनुवाद एज्जुदीन किरमानी द्वारा किया गया ।
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दिल्ली सल्तनत,
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Friday, April 24, 2009
जैन धर्म की कुछ बातें ....
आवश्यक चुर्णी के अनुसार चेतक महावीर का भक्त था ।
उतराध्ययन सूत्र से पता चलता है की बिम्बिसार की आस्था जैन धर्म में थी ।
ओवाईव सूत्र अजातशत्रु को महावीर का भक्त बतलाता है ।
कौशाम्बी नरेश की रानी मृगावती जैन धर्म को मानती थी ।
सिन्धु सौवीर के राजा उदयन भी जैन धर्म को मानते थे ।
जैन धर्म में संसार को दुख्मुलक माना गया है ।
संसार त्याग और संन्यास ही व्यक्ति को सच्चे सुख की ओर ले जा सकता है ।
जैन धर के अनुसार सृष्टि करता इश्वर नही है ।
जैन धर्म में भी सांसारिक तृष्णा -बंधन से मुक्ति को निर्वाण कहा गया है ।
कर्म फल से मुक्ति के लिए त्रिरत्न का अनुपालन आवश्यक है ।
उतराध्ययन सूत्र से पता चलता है की बिम्बिसार की आस्था जैन धर्म में थी ।
ओवाईव सूत्र अजातशत्रु को महावीर का भक्त बतलाता है ।
कौशाम्बी नरेश की रानी मृगावती जैन धर्म को मानती थी ।
सिन्धु सौवीर के राजा उदयन भी जैन धर्म को मानते थे ।
जैन धर्म में संसार को दुख्मुलक माना गया है ।
संसार त्याग और संन्यास ही व्यक्ति को सच्चे सुख की ओर ले जा सकता है ।
जैन धर के अनुसार सृष्टि करता इश्वर नही है ।
जैन धर्म में भी सांसारिक तृष्णा -बंधन से मुक्ति को निर्वाण कहा गया है ।
कर्म फल से मुक्ति के लिए त्रिरत्न का अनुपालन आवश्यक है ।
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Saturday, April 18, 2009
भगवान् महावीर ....
कल्पसूत्र के अलावा अचारान्ग्सुत्र में भी भगवान् महावीर के कठिन तप का वर्णन मिलता है ।
बारह वर्ष की घोर तपस्या के बाद महावीर को कैवल्य (सर्वोच्च ज्ञान )प्राप्त हुआ ।
उन्हें कैवल्य जाम्भिय्ग्राम के समीप रिजुपालिका नामक नदी के तट पर प्राप्त हुआ ।
कैवल्य प्राप्त होने के कारण ही उन्हें केव्लिन की उपाधि मिली ।
अपनी समस्त इन्द्रियों को जितने के कारण वह जिन कहलाये ।
अपरिमित पराक्रम दिखाने के कारण उनका नाम महावीर पड़ा ।
ज्ञान प्राप्ति के बाद उन्होंने आजीवन धर्म प्रचार किया ।
उनकी मृत्यु पावा में ४६८ इ पु में हुई ।
बारह वर्ष की घोर तपस्या के बाद महावीर को कैवल्य (सर्वोच्च ज्ञान )प्राप्त हुआ ।
उन्हें कैवल्य जाम्भिय्ग्राम के समीप रिजुपालिका नामक नदी के तट पर प्राप्त हुआ ।
कैवल्य प्राप्त होने के कारण ही उन्हें केव्लिन की उपाधि मिली ।
अपनी समस्त इन्द्रियों को जितने के कारण वह जिन कहलाये ।
अपरिमित पराक्रम दिखाने के कारण उनका नाम महावीर पड़ा ।
ज्ञान प्राप्ति के बाद उन्होंने आजीवन धर्म प्रचार किया ।
उनकी मृत्यु पावा में ४६८ इ पु में हुई ।
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Friday, April 17, 2009
कुछ जानिए भारतीय इतिहास के बारे में ...
अरबों ने अंक पद्धति भार्वासियों से सिखा ।
मत्स्य पुराण में लिंग पूजा का उल्लेख मिलता है ।
कालिदास शिवोपासक थे ।
भारवि ने अपने महाकाव्य किरातार्जुनीय में अर्जुन और शिव के बिच युद्ध का वर्णन किया है ।
वाकातक शासक प्रवार्शें द्वितीय को सेतुबंध नामक कृति का रचयिता माना जाता है ।
कनिष्क के दरबार में पार्श्व ,वसुमित्र और अश्वघोष जैसे विद्वान् थे ।
मेगास्थनीज के अनुसार मौर्य काल में बिक्री कर नही देने वाले को मृत्यु दंड मिलता था ।
बौध धर्म के अनुसार महापरिनिर्वान मृत्यु के बाद ही संभव है ।
मत्स्य पुराण में लिंग पूजा का उल्लेख मिलता है ।
कालिदास शिवोपासक थे ।
भारवि ने अपने महाकाव्य किरातार्जुनीय में अर्जुन और शिव के बिच युद्ध का वर्णन किया है ।
वाकातक शासक प्रवार्शें द्वितीय को सेतुबंध नामक कृति का रचयिता माना जाता है ।
कनिष्क के दरबार में पार्श्व ,वसुमित्र और अश्वघोष जैसे विद्वान् थे ।
मेगास्थनीज के अनुसार मौर्य काल में बिक्री कर नही देने वाले को मृत्यु दंड मिलता था ।
बौध धर्म के अनुसार महापरिनिर्वान मृत्यु के बाद ही संभव है ।
गुप्त साहित्य ....
पुराणों का जो रूप आज देखते है वह गुप्तकाल की ही देन है ।
रामायण और महाभारत को भी अन्तिम रूप गुप्त काल में ही दिया गया ।
नारद , कात्यायन , पाराशर , बृहस्पति आदि स्मृतियों की रचना इसी काल में हुई ।
हरीशेन महादंड नायक ध्रुव्भुती का पुत्र था जिसने प्रयाग प्रशस्ति की रचना की ।
हरिशेन समुद्रगुप्त के समय संधिविग्र्हिक ,कुमारामात्य और महादंड नायक के पद पर था ।
प्रयाग प्रशस्ति का पुरा लेख गद्य पद्य मिश्रित शैली में है ।
वासुल ने मंदसौर प्रशस्ति की रचना की ।
विशाख्दत ने दो नाटकों मुद्राराक्षस और देविचंद्र्गुप्तम की रचना की ।
मुद्राराक्षस में चाणक्य की योजनाओं का वर्णन है ।
देविचंद्र्गुप्तम में चन्द्रगुप्त द्वितीय के द्वारा शकराज के वध और ध्रुवदेवी के साथ विवाह का वर्णन है ।
रामायण और महाभारत को भी अन्तिम रूप गुप्त काल में ही दिया गया ।
नारद , कात्यायन , पाराशर , बृहस्पति आदि स्मृतियों की रचना इसी काल में हुई ।
हरीशेन महादंड नायक ध्रुव्भुती का पुत्र था जिसने प्रयाग प्रशस्ति की रचना की ।
हरिशेन समुद्रगुप्त के समय संधिविग्र्हिक ,कुमारामात्य और महादंड नायक के पद पर था ।
प्रयाग प्रशस्ति का पुरा लेख गद्य पद्य मिश्रित शैली में है ।
वासुल ने मंदसौर प्रशस्ति की रचना की ।
विशाख्दत ने दो नाटकों मुद्राराक्षस और देविचंद्र्गुप्तम की रचना की ।
मुद्राराक्षस में चाणक्य की योजनाओं का वर्णन है ।
देविचंद्र्गुप्तम में चन्द्रगुप्त द्वितीय के द्वारा शकराज के वध और ध्रुवदेवी के साथ विवाह का वर्णन है ।
Thursday, April 16, 2009
अगस्त्य ऋषि .और ..समुद्र पिने की घटना ...
संगम साहित्य से ज्ञात होता है की तमिल देश में वैदिक संस्कृति का स्वागत किया गया ।
दक्षिण में अनेक मन्दिर अगस्त्य ऋषि द्वारा स्थापित किया गया । इन्हे अगस्तेस्वर मन्दिर के नाम से जाना जाता है ।
अगस्त्य ऋग्वेद में मंत्र्द्रश्ता ऋषि है । उनकी पत्नी का नाम लोपामुद्रा मिलता है ।
अगस्त्य ऋषि ने वातापी नामक राक्षस का विनाश किया ।
कहा जाता है की अगस्त्य ऋषि द्वारा समुद्र का पानी पी जाने के कारण ही देवता समुद्र में छिपे असुरों को पराजित कर सके ।
तमिल भाषा और व्याकरण की उत्पति अगस्त्य ने की है ।
कौंडिन्य ऋषि का भी दक्षिण से सम्बन्ध मिलता है ।
दक्षिण में अनेक मन्दिर अगस्त्य ऋषि द्वारा स्थापित किया गया । इन्हे अगस्तेस्वर मन्दिर के नाम से जाना जाता है ।
अगस्त्य ऋग्वेद में मंत्र्द्रश्ता ऋषि है । उनकी पत्नी का नाम लोपामुद्रा मिलता है ।
अगस्त्य ऋषि ने वातापी नामक राक्षस का विनाश किया ।
कहा जाता है की अगस्त्य ऋषि द्वारा समुद्र का पानी पी जाने के कारण ही देवता समुद्र में छिपे असुरों को पराजित कर सके ।
तमिल भाषा और व्याकरण की उत्पति अगस्त्य ने की है ।
कौंडिन्य ऋषि का भी दक्षिण से सम्बन्ध मिलता है ।
संगम समाज ....
संगम साहित्य से पता चलता है की सुदूर दक्षिण के राज्यों में वैदिक यज्ञ का प्रचलन हो चुका था ।
अनेक ब्राह्मण मांस खाते थे और ताडी पीते थे । इससे सामाजिक अप्शय नही होता था ।
वेलालर संपन्न कृषक होते थे । सैनिक के रूप में इनका काफी महत्व था ।
सेना के नायकों को एनाडी की उपाधि दी जाती थी ।
वेलालर वर्ग के लोग सरकारी पदों पर नियुक्त किए जाते थे । चोल राज्य में इनकी उपाधि'' वेल ''और'' अर्शु ''थी ।
पांड्य राज्य में इनकी उपाधि कविदी थी ।
वेलालर के प्रमुखों को वेलिर कहा जाता था ।
संगम काल में लाल मिटटी के बर्तनों और लोहे के आविर्भाव का श्रेय वेलिर लोगो को दिया जाता है ।
पुलियन नामक जाति रस्सी की चारपाई बनाती थी ।
अनेक ब्राह्मण मांस खाते थे और ताडी पीते थे । इससे सामाजिक अप्शय नही होता था ।
वेलालर संपन्न कृषक होते थे । सैनिक के रूप में इनका काफी महत्व था ।
सेना के नायकों को एनाडी की उपाधि दी जाती थी ।
वेलालर वर्ग के लोग सरकारी पदों पर नियुक्त किए जाते थे । चोल राज्य में इनकी उपाधि'' वेल ''और'' अर्शु ''थी ।
पांड्य राज्य में इनकी उपाधि कविदी थी ।
वेलालर के प्रमुखों को वेलिर कहा जाता था ।
संगम काल में लाल मिटटी के बर्तनों और लोहे के आविर्भाव का श्रेय वेलिर लोगो को दिया जाता है ।
पुलियन नामक जाति रस्सी की चारपाई बनाती थी ।
प्राचीन साहित्य
सातवाहन शासक हाल द्वारा लिखी गई गाथासप्तशती प्राकृत भाषा की सुंदर रचना है ।
ईसा पूर्व दूसरी सती के मध्य में पतंजलि ने अपना महाभाष्य लिखा । यह पादिनी के अष्टाध्यायी की टिका है ।
चरक संहिता चिकित्सा शास्त्र की मौलिक कृति है ।
चरक कुषाण शासक कनिष्क का समकालीन था ।
मौर्योतर काल में ही सुश्रुत नामक एक शल्य चिकित्सक हुआ ।
मनुस्मृति ईसा पूर्व दूसरी सदी की रचना है ।
अश्वघोष ने बुद्ध चरित लिखा , यह भी कनिष्क का समकालीन था ।
अश्वघोष ने एक काव्य सौंदरानंद लिखा जो बुद्ध के सौतेले भाई आनंद के बौद्ध धर्म में दीक्षित होने के प्रषंग पर आधारित है ।
सबसे पहले सम्पूर्ण नाटक रचने का श्रेय भाष्य को है ।
भाष्य का स्व्प्न्वास्व्दतम प्रशिद्ध नाटक है जो राजा उदयन और वास्व्दता की कथा पर आधारित है ।
ईसा पूर्व दूसरी सती के मध्य में पतंजलि ने अपना महाभाष्य लिखा । यह पादिनी के अष्टाध्यायी की टिका है ।
चरक संहिता चिकित्सा शास्त्र की मौलिक कृति है ।
चरक कुषाण शासक कनिष्क का समकालीन था ।
मौर्योतर काल में ही सुश्रुत नामक एक शल्य चिकित्सक हुआ ।
मनुस्मृति ईसा पूर्व दूसरी सदी की रचना है ।
अश्वघोष ने बुद्ध चरित लिखा , यह भी कनिष्क का समकालीन था ।
अश्वघोष ने एक काव्य सौंदरानंद लिखा जो बुद्ध के सौतेले भाई आनंद के बौद्ध धर्म में दीक्षित होने के प्रषंग पर आधारित है ।
सबसे पहले सम्पूर्ण नाटक रचने का श्रेय भाष्य को है ।
भाष्य का स्व्प्न्वास्व्दतम प्रशिद्ध नाटक है जो राजा उदयन और वास्व्दता की कथा पर आधारित है ।
Wednesday, April 15, 2009
मौर्योतर काल और मानसून हवाओं की खोज ...
ईसा की पहली शादी में हिप्पोलास नामक ग्रीक नाविक ने अरब सागर में चलने वाली मानसून हवाओं की जानकारी दी ।
पेरिप्लस ऑफ़ दी इरिथ्रियाँ सी में भारत द्वारा रोमन साम्राज्य को निर्यात होनेवाले सामानों का विवरण दिया है जिसमे प्रमुख है मोती , हाथी दांत आदि ।
कश्मीर ,कोसल ,विदर्भ और कलिंग हीरों के लिए विख्यात थे ।
मगध वृक्षों के रेशों से बने वस्त्रों के लिए प्रसिद्ध था ।
बंगाल मलमल के लिए प्रसिद्ध था ।
भडोच के बंदरगाह से कश्मीर और उज्जैनी से लायी गई अनेक वस्तुओं का पश्चिमी देशों को निर्यात होता था ।
सोपारा और कल्याण पश्चिमी तट पर प्रसिद्ध नगर थे ।
इस समय प्रतिष्ठान नगर भी प्रमुख व्यापार का केन्द्र था ।
पेरिप्लस ऑफ़ दी इरिथ्रियाँ सी में भारत द्वारा रोमन साम्राज्य को निर्यात होनेवाले सामानों का विवरण दिया है जिसमे प्रमुख है मोती , हाथी दांत आदि ।
कश्मीर ,कोसल ,विदर्भ और कलिंग हीरों के लिए विख्यात थे ।
मगध वृक्षों के रेशों से बने वस्त्रों के लिए प्रसिद्ध था ।
बंगाल मलमल के लिए प्रसिद्ध था ।
भडोच के बंदरगाह से कश्मीर और उज्जैनी से लायी गई अनेक वस्तुओं का पश्चिमी देशों को निर्यात होता था ।
सोपारा और कल्याण पश्चिमी तट पर प्रसिद्ध नगर थे ।
इस समय प्रतिष्ठान नगर भी प्रमुख व्यापार का केन्द्र था ।
अश्वघोष और कनिष्क में क्या रिश्ता था ?
कनिष्क कुषाण वंश का तीसरा शासक था । पहला शासक कुजुल कैद्फिसस था ।
कुजुल कैद्फिसस ने काबुल तथा कश्मीर में अपनी सत्ता स्थापित की और सिक्कों पर महाराजाधिराज की उपाधि खुदवाया ।
कुजुल कैद्फिसस के बाद उसका पुत्र विम कैफिसस गद्दी पर बैठा ।
वह शैव धर्म से प्रभावित था । उसके सिक्कों पर नंदी और त्रिशूल की आकृति मिलती है ।
कनिष्क का राज्यारोहण ७८ इस्वी में माना जाता है ।
कनिष्क की राजधानी पुरुषपुर में थी ।
अश्वघोष कनिष्क के दरबार को सुशोभित करते थे ।
कुजुल कैद्फिसस ने काबुल तथा कश्मीर में अपनी सत्ता स्थापित की और सिक्कों पर महाराजाधिराज की उपाधि खुदवाया ।
कुजुल कैद्फिसस के बाद उसका पुत्र विम कैफिसस गद्दी पर बैठा ।
वह शैव धर्म से प्रभावित था । उसके सिक्कों पर नंदी और त्रिशूल की आकृति मिलती है ।
कनिष्क का राज्यारोहण ७८ इस्वी में माना जाता है ।
कनिष्क की राजधानी पुरुषपुर में थी ।
अश्वघोष कनिष्क के दरबार को सुशोभित करते थे ।
मौर्यकालीन समाज ....
मौर्य समाज में चार वर्णों के अतिरिक्त अनेक वर्णशंकर जातियाँ थी । जैसे अम्बष्ठ , निषाद , पार्शव , रथकार , छता, वेदेहक , मागध , सूत , वेण, चांडाल श्वपाक आदि ।
राजा के शिक्षकों , यज्ञ कराने वाले पुरोहित , और वेदपाठी ब्राह्मणों को दान में दी जाने वाली भूमि ब्रह्म्देय कहलाती थी ।
कौटिल्य के अनुसार चांडालों के अलावा सभी वर्णशंकर जातियाँ शुद्र है ।
''तंतुवाय'' जुलाहे को तथा'' रजक ''धोबी को कहा जाता था ।
वर्णशंकर जातियों की उत्पति विभिन्न वर्णों के अनुलोम और प्रतिलोम विवाह से मानी जाती है ।
मेगास्थनीज ने भारतीय समाज को सात जातियों में विभक्त किया है ।
ये सात जातियाँ है ...दार्शनिक , किसान , अहीर , कारीगर , सैनिक , निरीक्षक , सभाषद ।
यह वर्णन भारतीय समाज से मेल नही खाता है ।
राजा के शिक्षकों , यज्ञ कराने वाले पुरोहित , और वेदपाठी ब्राह्मणों को दान में दी जाने वाली भूमि ब्रह्म्देय कहलाती थी ।
कौटिल्य के अनुसार चांडालों के अलावा सभी वर्णशंकर जातियाँ शुद्र है ।
''तंतुवाय'' जुलाहे को तथा'' रजक ''धोबी को कहा जाता था ।
वर्णशंकर जातियों की उत्पति विभिन्न वर्णों के अनुलोम और प्रतिलोम विवाह से मानी जाती है ।
मेगास्थनीज ने भारतीय समाज को सात जातियों में विभक्त किया है ।
ये सात जातियाँ है ...दार्शनिक , किसान , अहीर , कारीगर , सैनिक , निरीक्षक , सभाषद ।
यह वर्णन भारतीय समाज से मेल नही खाता है ।
चाणक्य ....
कौटिल्य (चाणक्य ) ने वर्णाश्रम व्यवस्था को सामाजिक संगठन का आधार माना है ।
कौटिल्य के अनुसार वर्णाश्रम व्यवस्था की रक्षा करना राजा का कर्तव्य है ।
उन्होंने शूद्रों को शिल्पकला और सेवावृति के अलावा कृषि , पशुपालन और वाणिज्य से जीविका चलाने की अनुमति दी है ।
अर्थशास्त्र में शूद्रों को आर्य कहा गया है ।
अर्थशास्त्र के अनुसार आर्य्शुद्रों को दास नही बनाया जा सकता है ।
कौटिल्य ने ऐसी स्त्रियों को अनिष्कासिनी कहा है जो घर के अन्दर ही रहती थी ।
कौटिल्य के अर्थशास्त्र में सती प्रथा का कोई उल्लेख नही मिलता ।
अर्थशास्त्र में लिखा है की अकाल के समय राजा जनता की भलाई के लिए कदम उठाता था ।
कौटिल्य के अनुसार वर्णाश्रम व्यवस्था की रक्षा करना राजा का कर्तव्य है ।
उन्होंने शूद्रों को शिल्पकला और सेवावृति के अलावा कृषि , पशुपालन और वाणिज्य से जीविका चलाने की अनुमति दी है ।
अर्थशास्त्र में शूद्रों को आर्य कहा गया है ।
अर्थशास्त्र के अनुसार आर्य्शुद्रों को दास नही बनाया जा सकता है ।
कौटिल्य ने ऐसी स्त्रियों को अनिष्कासिनी कहा है जो घर के अन्दर ही रहती थी ।
कौटिल्य के अर्थशास्त्र में सती प्रथा का कोई उल्लेख नही मिलता ।
अर्थशास्त्र में लिखा है की अकाल के समय राजा जनता की भलाई के लिए कदम उठाता था ।
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